Triratna : Info

त्रिरत्न बौद्ध महासंघ" एक परिचय

त्रिरत्न बौद्ध महासंघ एक नये प्रकार का आध्यात्मिक संघ है, 14 अक्टूबर 1956 को बोधिसत्व बाबासाहेब ने नागपुर की पवित्र दीक्षाभूमि में धर्मान्तरण करके बौद्धधर्म को पुनर्जीवित किया और भारतीय इतिहास में स्वर्णिम युग का आरंभ किया | इस आंदोलन की ठोस बुनियाद के लिए पूज्य बाबासाहेब ने अपने जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किए, वर्ष 1950 का महाबोधि पत्रिका में प्रकाशित *Buddha and future of his Religion* नामक लेख, *Buddhist society of India* नामक संस्था की स्थापना और *Buddha and his Dhamma*नामक महान ग्रंथ की रचना अति महत्वपूर्ण है. बाबासाहेब धम्मदीक्षा के पहले और धम्मदीक्षा के बाद बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अत्यंत बेचैन हो उठे थे. इसलिए उन्होंने 1954 में बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की. जो 4 मई 1955 को रजिस्टर्ड हुई. इस संस्था के उन्होंने 10 उद्देश्य निर्धारित किए, इसी को मार्गदर्शक तत्व मानकर त्रिरत्न बौद्ध महासंघ आगे बढ़ रहा है |

आध्यात्मिक तौर पर समान आदर्श और समान वचनबद्धता के कारण संघ के सभी सदस्य एकता के सूत्र मे बंधे होते हैं| वे एक दूसरे को आध्यात्मिक जीव की तरह महसूस करते हैं| तथा आध्यात्मिक रूप से विकास करना चाहते हैं| प्रत्येक (स्थानीय) त्रिरत्न बौद्ध महासंघ एक दूसरे से सहकार्य के आधार पर धम्मचारियों के समूह द्वारा चलाया जाता है| प्रत्येक त्रिरत्न बौध्द महासंघ की अपनी जगह या स्वयं की नियमित गतिविधियां होती हैं| जैसे ध्यान वर्ग, अभ्यास वर्ग, शिविर आदि| इन सभी का केवल एक ही मक़सद है, व्यक्तिगत विकास के लिए लोगों की मदद करना | जो भी कोई शामिल होना चाहता है ये सभी गतिविधियां उनके लिए खुली होती हैं| जिनमें धम्मचारी/धम्मचारिणी इन गतिविधियों को अपनी सेवा देते हैं| ये धम्मचारी विभिन्न त्रिरत्न बौध्द महासंघ से अपने सम्बन्ध स्थापित करने के लिए स्वयं को झोंक देते हैं| वे एक दूसरे के सानिध्य में रहने का प्रयास करते हैं|

बोधि का अर्थ है उच्चतम या महानतम आध्यात्मिक ज्ञान (बुद्धत्व). जो कि बौद्ध जीवन का अन्तिम लक्ष्य है. सत्व का अर्थ है प्राणी. अतः बोधिसत्व का अर्थ है "ऐसा प्राणी जो बुद्धत्व प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है." एक ऐसा जाग्रत प्राणी जिसका सारा जीवन, सारी ऊर्जा बोधि (enlightenment) के लिए समर्पित है. बुद्धत्व एक ऐसी अवस्था है जिसमें प्रज्ञा और करुणा दोंनों का समावेश होता है़. बोधिसत्व एक उत्तम प्राणी है, क्योंकि उसका सम्पूर्ण जीवन बोधि प्राप्ति के लिए समर्पित है. इसलिए बोधिसत्व एक आदर्श बौद्ध है. कोई व्यक्ति बोधिचित्त की उत्पत्ति से बोधिसत्व बनता है. जो सतत धार्मिक संगति, धार्मिक वातावरण के सानिध्य में लगातार रहने, अच्छा साहित्य पढ़ने, ध्यान अभ्यास या कभी-कभी पीड़ियों तक पुण्य कर्म के प्रभाव आदि से बोधिचित्त का उगम होता है. उचित परिस्थिति में बोधिचित्त रूपी बीज प्लवित होने लगता है. महायान ने इस बात पर जोर दिया है कि हर एक को बोधिसत्त्व का ध्येय रखना चाहिए बोधिसत्व का ध्येय अपनाना ही बोधिसत्व आदर्श है. फिर कोई भिक्षु है या सामान्यजन. सभी को हर प्राणी मात्र के लिए बुद्धत्व की इच्छा रखनी चाहिए. यह बुद्धत्व हेतु एक शक्तिशाली प्रेरणा होती है, जो अपने सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करती है और वह अपने अस्तित्व का प्रमुख श्रोत या प्रकृति बनती है
बोधिसत्व आदर्श से प्रेरणा लेकर एक साधारण मानव भी उच्च आध्यात्मिक विकास के शिखर पर पहुँच सकता है और वह अपने आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ अन्य प्राणियों के विकास में सहायता कर सकता है. वह प्रज्ञा, करुणा और वीर्य (उत्साह) इन गुणों के द्वारा जगत के सत्वों को उनके नर्क रूपी दुखों से मुक्ति दिलाने की क्षमता प्राप्त करके परहित एवं सत्वों के कल्याणार्थ अपने जीवन का बलिदान करता ह| ै. *पूज्य बाबासाहेब डा.अम्बेडकर एक बोधिसत्व-* आधुनिक जगत के बोधिसत्व पूज्य बाबासाहेब इसके जीते जागते उदाहरण हैं. हम जानते हैं कि बोधिसत्व वह है जो केवल अपने विकास के लिए ही नहीं तो दूसरों के विकास के लिए भी धम्ममार्ग का अनुसरण करता है. यह करुणा के सिद्धांत का प्रतीक है. जो दूसरों की देखभाल करता है और उन्हें धम्ममार्ग पर आगे ले जाता है. पूज्य बाबासाहेब डा. अम्बेडकर ने सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त की थी. वे बड़े आराम से सम्पन्न और सुविधापूर् ण जीवन जी सकते थे. जिस समाज में उनका जन्म हुआ, बड़ी आसानी से उसका त्याग कर खुद का सुखी जीवन जी सकते थे. परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्हों ने देश के उपेक्षित लोगों के उत्थान के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया. यह उन्होंने अपने जीवन का भारी मूल्य चुकाया. यह सारे संसार के लिए बोधिसत्व आदर्श का जीता जागता नमूना है. उनका चित्त बोधिसत्व का चित्त था जो एक बोधिसत्व की प्रकृति कहलाती है. उनका जीवन स्वार्थमुक्त था. भन्ते संघरक्षितज ी कहते हैं कि आध्यात्मिक विकास का ही यह अर्थ है कि व्यक्ति स्वार्थहीन हो रहा है. वह नैसर्गिक तौर से दूसरों के कल्याण में रुचि लेता है. उसे दूसरों के कल्याण में रुचि लेने के लिए जोर नहीं लगाना पड़ता

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